
Talking Mirror
सुरेंद्र जी, एक बात पकड़ लीजिए। आपने जो लिखा उसमें आगे क्या करेंगे यह तो साफ है, पर बीच में एक शब्द आ गया साक्षी होकर देखूंगा। जरा गौर करिए, देखने वाला कोई अलग खड़ा नहीं हो सकता, देखने वाला वही मन है जो राहत भी मांगता है। तो सवाल यह नहीं कि साक्षी बनकर चाल पकड़ूंगा, सवाल यह है कि जब पकड़ में आएगा, उस पल रुकने की नीयत बनी रहेगी या नहीं। वरना साक्षी बनने का विचार भी एक और आसान राहत बन सकता है, असली देखने से पहले ही तसल्ली मिल जाना।















