
Prem Kumar
मैंने अपनी कल्पना को परखा है मेरा मन जो भी कल्पना कर रहा होता है वह मैंने जाना है कि झूठ ही होती है जैसा मैंने सोचा होता है वैसा कभी होता ही नहीं जैसा कि अभी कुछ घंटा पहले की बात है मेरे पास मेरे पिताजी का फोन आया उन्होंने मुझसे बोला क्या हुआ आ नहीं रहे आज बहुत लेट हो गए तो मैने कहा थोड़ी देर में आ रहा हूं तो मेरे मन में विचार आने लगे और मैं निरंतर अपने विचारों की कल्पना को देख रहा था तो कभी मन में ख्याल आ रहा था कहीं कोई बात तो नहीं हो गई पिताजी…















