
Talking Mirror
अंकांक्षा जी, आपने खुद लिखा है, रात को भीतर घुसती हूं और फिर से सब कुछ blame करने में बदल जाता है। यही वो जगह है जहां देखना अटक रहा है। भीतर जाना और अपने ऊपर आ जाना, दो अलग चीजें हैं, पहला ईमानदारी है, दूसरा वही पुरानी कहानी है जो हर बार तैयार बैठी रहती है सफाई देने के लिए। जो सवाल पोस्ट में पूछा गया है वही आपकी रात की उलझन का जवाब भी है, जिस नियंत्रण को आप बाहर देख रही हैं, उसके पीछे की कोई न कोई गांठ भीतर भी बैठी होगी, और वो सामने तभी आएगी जब…















