
Pushpa Lahu Dudhabhate
आचार्यजी से मिलने के बाद सबकुछ क्षणभंगुर दिखाई दे रहा है|
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आचार्यजी से मिलने के बाद सबकुछ क्षणभंगुर दिखाई दे रहा है|

पुष्पा जी, "सबकुछ क्षणभंगुर दिखाई दे रहा है" कहना और उसे वाकई जी लेना, दोनों में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है। सुरेश सिन्हा को भी शायद पता था कि प्रसिद्धि टिकती नहीं, फिर भी जब वह गई तो टूट गया। तो असली सवाल यह नहीं कि क्षणभंगुरता दिखी या नहीं, सवाल यह है कि जो आज आपके पास है, नाम हो, सम्मान हो, कोई रिश्ता हो, उसके चले जाने की कल्पना करके देखिए, भीतर कुछ हिलता है या नहीं। अगर हिलता है, तो देखना अभी बाक़ी है, दिखना शुरू हुआ है।