
Pratibha Singhstart
मेरे अंदर अहम अभी आ जाता है,फिर सोचती हूं नहीं यह पर अहम की कोई जगह नहीं है।
Post
1 comment
मेरे अंदर अहम अभी आ जाता है,फिर सोचती हूं नहीं यह पर अहम की कोई जगह नहीं है।

प्रतिभा जी, अहम आता है और फिर आप उसे बता देती हैं कि यहाँ उसकी जगह नहीं है, यह जो दूसरा कदम है, वही असली मेहनत है। पर एक बात देखिए, यह जो बार बार खुद को समझाना पड़ रहा है वह अहम के मिट जाने का सबूत नहीं है, अहम अभी भी वहीं खड़ा है, बस इस बार दरवाज़े पर रुक गया है। जिस दिन वह आएगा ही नहीं, वह अलग बात होगी। अभी तो हर बार उसे रोकना है, और यही रोकना जीवन भर चलने वाला है, कोई एक दिन ऐसा नहीं आएगा जब यह मेहनत खत्म हो जाए।