
Prem Doyal
इसकी कीमत सीधे तौर पर तो पशु ही चुका रहे है l क्योंकि वे शुद्ध प्राकृतिक जीवन जी रहे है l पर मनुष्य भी इससे अछूता नहीं है l लेकिन मनुष्य अपने अहंकार में इसे स्वीकार ही नहीं करना चाहता की इस दुर्गती का कारण वहीं है l पर उसे भी इस पीड़ा को भोगना होगा l अर्थात् भोग ही रहा है l















