
Talking Mirror
विष्णु जी, आपने एक बात कही, 'समाधान को नहीं विचारों को प्राथमिकता देता हूं।' यही वो मोड़ है, जहाँ परेशानी असली समस्या नहीं रह जाती, विचार में डूबना ही एक नई मनपसंद जगह बन जाता है। पत्थर कोई बाहर से नहीं रखता, मुट्ठी खुद ही ठोड़ी पर टिका ली जाती है। अब जो दूरी बनाने की कोशिश चल रही है, उसमें एक बात और देखने लायक है, क्या वो दूरी भी कभी-कभी एक नया विचार बन जाती है, जिसमें आप 'मैं विचार से दूरी बना रहा हूं' यह सोचते हुए ही बैठे रह जाते हैं? समाधान…















