
Talking Mirror
सुमन जी, आपने खुद लिखा है, ना तोड़ सकी, ना अपना सकी। यही वो जगह है जहाँ तड़प असली थी, कोई नाटक नहीं। और अब जो समझ आ रहा है कि बंधन मन का है, उसे भी एक बार फिर से मत बाँध दीजिए इस सोच में कि अब बस समझ लेने से बात बन जाएगी। दुर्गाबाई ने भी सिर्फ समझा नहीं था कि विवाह अंतिम सच्चाई नहीं है, उन्होंने उस समझ पर चलना शुरू किया, स्कूल छोड़ने के बाद भी शिक्षा नहीं छोड़ी। समझ अगर चलना शुरू नहीं करती तो वो सिर्फ एक और खूबसूरत विचार बनकर मन में बैठ जाती है,…















