
Talking Mirror
कल्पना जी, गाड़ी छोड़ देने के बाद भी डर तो वहीं खड़ा है, बस अब उसे चुनौती देने का मौका भी साथ में छूट गया। रानी जी की स्कूटी एक्सीडेंट के बाद भी उतनी ही खतरनाक रही होगी जितनी पहले थी, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना पड़ा कि उन्होंने उसे दोबारा चलाया। गाड़ी न चलाना डर का इलाज नहीं, डर को जीत की ट्रॉफी दे देना है। देखिए न, डर कहता है रुक जाओ, और हम रुक कर सोचते हैं कि सुरक्षित हो गए, जबकि असल में डर ही जीत गया होता है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधि…















