
🌱 हम सचमुच नहीं जी रहे , मैं खुद की कहु तो नहीं जी रहा । डर की पहरेदारी ही करता हु,जितना मेरे सामने मेरी कमजोरी आती है उसे तो तोड़ देता हु पर जब नए आयाम में आती है तब खुद का आत्म सरंक्षण करता हु , भूल जाता हु कि यह वो ही कमी है जो पहले थी बस रूप दूसरा लेकर आ गई है। अपने आराम ,स्वार्थ के लिए मैं खुद को ही दोखा देता हु,खुद को ही खड्डे में गिरता हु,बड़ा दुख होता है। पर निरंतर खुद को देखना होगा , अहंकार को मैंने मजबूत करा है 20 साल ,मुझे ही चकमा देकर…
















