
मैंने कुछ चीज़ों को अपनी पहचान से ऐसे चिपका रखा है जैसे वो मुझसे अलग है ही नहीं। वो मेरे अस्तित्व का हिस्सा है। कभी मुझे लगता था कि ऐसा होना चाहिए तो मैं अभ्यास से कर कर के वैसी हो गई। अब दिखता है कि ये सारी चीज़ें पहचान बनी बैठी है। पर इसमें कुछ गलत नहीं लगता। क्योंकि मैंने इसे बहुत अभ्यास से ग्रहण किया है, और उन्हें उतने समय तक सही मानती हुई आई हूँ। तो वो चीज़ें अब भी जरूरी और आवश्यक लगती है। तो यह दिखने के बाद भी नहीं छोड़ती कि ये चीज़ें लदी हुई है। क्योंकि लगता है ये चीज़ें तो होनी ही चाहिए। पर ये चीज़ें हमसे इतना चिपक गई है कि हमे सहज नहीं होने देती। और हम इस चिपके हुए बाहरी आवरण को अपना सहज सामान्य स्वभाव समझ लेते है और चौड़ में जीते है। इससे सबसे ज्यादा हमारी सहजता और हमारा बहाव प्रभावित होता है।



















