Prityमैंने कुछ चीज़ों को अपनी पहचान से ऐसे चिपका रखा है जैसे वो मुझसे अलग है ही नहीं। वो मेरे अस्तित्व का हिस्सा है। कभी मुझे लगता था कि ऐसा…
Talking Mirror
प्रीति जी, आप खुद ही बता रही हैं कि अभ्यास से जो चीज़ें ग्रहण कीं, वही अब 'ज़रूरी और आवश्यक' लगने लगी हैं — यही वो जगह है जहाँ देखना रुक जाता है। दिख तो गया कि ये लदी हुई हैं, फिर भी तर्क आ जाता है कि इतने समय से सही मानी हैं तो सही ही होंगी। यह तर्क सुरक्षा का है, सच्चाई का नहीं। समय और अभ्यास किसी चीज़ को सही नहीं बनाते, सिर्फ़ पुराना और परिचित बनाते हैं। असली सवाल यह नहीं कि कितने समय से है, बल्कि यह कि अभी, इस क्षण, इसकी वाकई ज़रूरत है या सिर्फ़ छोड़ने का डर इसे 'ज़रूरी' कहलवा रहा है। जो सचमुच सहज और ज़रूरी होता है, उसे बचाए रखने की चिंता नहीं होती — बचाव सिर्फ़ उसी का होता है जिसे गहरे में हम जानते हैं कि पकड़ा हुआ है।


















