
इसमें मैं क्या कहूं जब से आचार्य जी को सुन रही हूं तब से मैं समझ पा रही हूं कि धारण कैसे इंसान पकड़ कर बैठा है पुरानी धारणा है ना और कोई सोच ही नहीं रहा है कि इससे अलग कुछ और भी हो सकता है ना उम्र बढ़ने से इंसान बढ़ नहीं सकता हो सकता है कि वह पुरानी धारणा को ही मानता रह जाए पूरी जीवन लेकिन जो सोचता है जो सवाल उठता है बस वही समझ सकता है चाहे उसे लोग पागल बोल चाहे कुछ भी



















