
❓ प्रकृति को बचाने की चिंता करते हुए, क्या हम उस सुविधा और उपभोग पर सवाल उठाने को तैयार हैं, जिसके बिना हमारा अपना 'मैं' असहज हो जाता है? हा कहना भी गलत होगा .....और ना कहना एक शर्मिंदगी होगी । क्योंकि जोश जोश में हम कह तो देंगे कि " हाँ में तैयार हूं ...अपना लालच कम करने को ....अपनी गलत इक्छाओं का दमन करने को ....प्रकृति संरक्षण को ....."। परन्तु यह तो हम भी जानते हैं कि हमारे अंदर जो लोभी अहंकार बैठा है वो हमें ऐसा करने से जरूर रोकेगा और कई बार हम रुक भी जाएंगे । बात यहां सिर्फ कोरल की नहीं ....कोरल के माध्यम से यह विद्या अविद्या पोस्ट हमें बताती कि हम केवल अपनी तुच्छ / निम्न स्तर की इच्छाओं / कामनाओं की पूर्ति हेतु प्रकृति के अन्य जीवों को कुछ समझते ही नहीं हैं ....इंसान मान चुका है कि यह पृथ्वी मेरी है और मैं ही इसका कर्ता धर्ता हूं ....यानी " अपुन इच भगवान है " वाला भाव। कोरल को " समुद्री वर्षावन " भी कहा जाता है और अध्ययन बताते हैं कि यह कोरल ....जमीन पर उपस्थित प्राकृतिक विविधता से कही ज्यादा समृद्ध हैं । हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम अपनी बिना मतलब इक्छाओं पर नियंत्रण रखें। क्योंकि हम केवल नियंत्रण करने के लायक बचे हैं ...सुधार की उम्मीद तो हमसे .... प्रकृति और भगवान ने भी करना छोड़ दिया है ।



















