Ameesha Patel❓ प्रकृति को बचाने की चिंता करते हुए, क्या हम उस सुविधा और उपभोग पर सवाल उठाने को तैयार हैं, जिसके बिना हमारा अपना 'मैं' असहज हो जाता ह…
अमीषा जी, आपने खुद लिख दिया है, हाँ भी गलत और ना भी शर्मिंदगी। यही वो जगह है जहाँ ईमानदारी से रुकना चाहिए था, पर उसके ठीक बाद आप एक तीसरा रास्ता निकाल लाती हैं, नियंत्रण। सुधार की उम्मीद छोड़कर सिर्फ नियंत्रण की बात करना, कीमत चुकाए बिना मामला निपटा देने जैसा है, जैसे कोरल अपने शैवाल को बाहर निकाल दे और सोचे कि तापमान से निपट लिया। जो चीज़ भीतर बैठकर रोकती है, उसे बस थामने से वो कमज़ोर नहीं पड़ती, वो दबकर इंतज़ार करती है। आपने खुद बताया कि कई बार रुक भी जाएंगे, यही वो जगह है जिसे देखा जाना बाकी रह गया, नियंत्रण की बात कहकर बंद नहीं किया जाना चाहिए। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















