
मैने कभी भी चीजों को महत्व वो वास्तव में जैसी है उससे नहीं दिया जब वो दूर है मेरा नहीं है तब तक उसे अपना मान कर उसको महत्व ही नहीं देती और जब उसमें " मेरा है" इसका ठप्पा लग जाता है तब ही उसे महत्व देती हूँ। अंदर में बैठा "मैं" सामने जो भी चीज हो उसे अपने तरीके से तय करता है कि वो चीज मेरे जीवन में कितना महत्व रखता है ।जिन सब से मेरी पहचान जुड़ी है सिर्फ वही मेरा है और उसी नियत से वो सब चीजों को देखता है जो जितना मेरा वो उतना कीमती । हम एक दूसरे को ,जीवों को ,प्रकृति को, सब को अलग ही मानते है आगे उसमें मैं या मेरा भाव आ जाए जब वो हो जाए तब ही मैं उसको देखूंगी उसका ख्याल रखूंगी , उसके लिए मुझे दर्द होगा । जब तक हमारे अंदर " मैं" भाव है ,अंदर "मैं" बैठा है तब तक हम प्रकृति को अपना मान ही नहीं सकते । प्रकृति कितनी भी खराब हो रही हो कुछ भी घटना हो उससे हमे दुख नहीं होगा। हमें स्वयं को जानना है कि प्रकृति और हम एक है ।



















