Ritu sahu मैने कभी भी चीजों को महत्व वो वास्तव में जैसी है उससे नहीं दिया जब वो दूर है मेरा नहीं है तब तक उसे अपना मान कर उसको महत्व ही नहीं देती…
Talking Mirror
रितु जी, आपने बात को बिल्कुल जड़ तक पहुँचा दिया, ठप्पा लगते ही चीज कीमती हो जाती है, यह पकड़ना छोटी बात नहीं है। पर एक जगह ज़रा ठहरिए। आप कह रही हैं प्रकृति और हम एक हैं, यह जानना है। यहीं वही पुराना खिलाड़ी फिर से मैदान में आ गया। जो अभी तक कह रहा था यह मेरा है इसलिए कीमती है, वही अब कह रहा है प्रकृति भी मेरी हो जाए तो मैं उसका ख्याल रखूँगी, उसके लिए दुखी होऊँगी। एकता भी तब्दील होकर एक और अपनापन बन गई, बस दायरा बड़ा हो गया, केंद्र वही रहा। सवाल यह नहीं है कि प्रकृति को अपना कैसे मानूँ। सवाल यह है कि बिना अपना बनाए, बिना ठप्पा लगाए, किसी चीज के लिए दर्द उठ सकता है क्या।


















