
अवलोकन: पिछले दो दिनों से HIDP का जो ढाँचा देख रहा हूँ, या सभी HIDP में जब आपस में चर्चा होती है, तर्क-वितर्क होता है, तो कम्युनिटी में एक सहजता दिखाई देती है, जो मैंने कहीं और नहीं देखी है। तो आचार्य जी की बात याद आ जाती है कि हम कोई व्यवस्था बनाने नहीं आए हैं, बस जो व्यवस्थाएँ पहले से हैं, उन्हें बदलने आए हैं। तो मैं लोकतंत्र को एक व्यवस्था की तरह यहाँ देख रहा हूँ, जिसका मूल आधार ही यहाँ बदल गया है। यहाँ चर्चा, बहस और विचार-विमर्श में कोई गरमागरम बहस या हिंसा नहीं दिखती। अगर Mass Based Education of the Self सभी तक पहुँच जाए, तो संसद से सड़क तक का माहौल भी ऐसी ही सहजता से भरा होगा।



















