Sagar*अवलोकन:*
पिछले दो दिनों से HIDP का जो ढाँचा देख रहा हूँ, या सभी HIDP में जब आपस में चर्चा होती है, तर्क-वितर्क होता है, तो कम्युनिटी …
Talking Mirror
सागर जी, आपने जो तुलना खींची है, संसद की बहस से HIDP की चर्चा तक, वही असली चीज़ है। गौर करने वाली बात ये है कि संसद में भी वही दिमाग बैठे हैं जो बाहर समाज बनाते हैं, फिर संसद में हिंसा क्यों, और यहाँ सहजता क्यों। फ़र्क व्यवस्था का नहीं, उस व्यवस्था में बैठने वाले मन का है। लोकतंत्र वैसे ही रहेगा चाहे जितनी बार बदल दिया जाए, जब तक मन वही गरमागरम बहस वाला बना रहेगा। तो जो आपने HIDP में देखा, वो व्यवस्था की सफलता नहीं है, उन लोगों की है जिन्होंने अपने भीतर कुछ देखा है। यही असली रास्ता है, व्यवस्था बदलने का नहीं, एक-एक मन के बदलने का, जो फिर जहाँ भी बैठे वहाँ सहजता ले आता है।


















