
हम सिर्फ अपनी अतृप्त इच्छाओं के लिए लगातार अधिक उपभोग करके स्वयं और प्रकृति, दोनों को नुकसान पहुँचा रहे हैं । घर से बाहर निकलते ही यह सोचती थी कि क्या खाना है, जबकि पेट भरा होता था। अब समझ में आया कि वह मैं नहीं, मेरा अहंकार था, जो माँग रखता था। अब जब भी ऐसा होता है, तो मैं कहती हूँ, पेट तो भरा है, फिर क्यों खाना?



















