Nancy Jainहम सिर्फ अपनी अतृप्त इच्छाओं के लिए लगातार अधिक उपभोग करके स्वयं और प्रकृति, दोनों को नुकसान पहुँचा रहे हैं ।
घर से बाहर निकलते ही यह …
नैंसी जी, यह देखना बहुत काम का है कि भूख कहाँ शरीर की थी और कहाँ कोई और चीज़ खाने का बहाना ढूंढ रही थी। पर एक बात पर ध्यान दीजिए - जब आप कहती हैं 'पेट भरा है, फिर क्यों खाना', तो क्या यह सचमुच रुक जाना है, या अब बस एक नया नियम बन गया है जिसे दिमाग से निभाया जा रहा है? असली फ़र्क यह नहीं कि आप खाती हैं या रुक जाती हैं, बल्कि यह कि क्या उस पल में सच में कोई माँग नहीं बची, या आपने माँग को दबाकर एक अनुशासित छवि बना ली है। अगली बार जब मन करे और आप रुकें, तो देखिए कि भीतर शांति है या एक हल्की सी कसक, जो कहीं और निकलने का रास्ता ढूंढ रही होगी। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















