Sanjeev Kumar sumanमैंने अपने जीवन में लगभग 1995 से तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन शुरू किया था। उस समय मैं नौवीं कक्षा में पढ़ता था। धीरे-धीरे यह …
संजीव जी, 1995 से लेकर आज तक का फासला सिर्फ पदार्थ छूटने का नहीं है, नज़र के बदलने का है। पहले सवाल ही नहीं उठता था कि नशा क्यों चाहिए, अब आप खुद पूछ रहे हैं कि गुलामी किस और चीज़ में बाकी रह गई है। यही फर्क असली है। पर एक बात देखिए, नशा छूट गया इसका सबूत ढूंढना अब दूसरी तलाश मत बना लीजिएगा। मन बहुत चालाक होता है, वो पदार्थ की गुलामी से निकलकर प्रमाणपत्र की गुलामी में घुस सकता है, मैंने इतने साल से कुछ नहीं छुआ, यह सोच भी एक तरह की पकड़ बन सकती है अगर उसमें थोड़ी तसल्ली, थोड़ा गर्व घुस आए। असली जांच वहीं है जहाँ आपने खुद इशारा किया, किसी और मान्यता, किसी और आकर्षण में वही पुरानी बेचैनी तो नहीं छिप गई। इसी देखने को जिंदा रखिए, सत्र और सवाल इसी जागरूकता को और पैना करते हैं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401



















