
सीमाएं जो मैंने मेरे बारे में बनी धारणा के कारण स्वीकार की है - मेरी शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुई है, रीडिंग और ग्रामर में अंग्रेजी भाषा ठीक है, लेकिन ज्यादा बोलने की प्रैक्टिस न होने के कारण जब सत्र (अंग्रेजी) में होते हैं तो, धारणा यह रहती है कि समझने में टाइम लगेगा और समझना साथ ही 3D इमैजिनेशन नहीं हो पायेगा जैसे सत्र (हिन्दी) में कोई घटना, बचपन की यादें एकाएक चमक उठती हैं। ये मेरी धारणा ही है क्योंकि कल का इंग्लिश सत्र समझ में आ रहा था । बाहरी पारिस्थितियां जिन्होंने मेरी सीमा तय की है - मैं फेस टू फेस सत्र अटेंड करना चाहती हूं , अनुदान राशि बीच में आ जाती है लेकिन मेरी खुद ही गहरी नीयत नहीं बन पा रही है आचार्य जी के सामने आने की । वो जो कर रहे हैं मेरे लिए मुझे मेरे बंधनों से आजाद करने के लिए, अपने उच्चतम संभावनाओं को प्राप्त कर सकु इसके लिए और मैं संस्था का काम आसान करने के बजाय बढ़ाये ही रहती हूं अपना रिपोर्ट कार्ड न सुधार करके।



















