
1 मै किसी भी चीज को नहीं देख रहा हु मैं बस अपने अनुभव और पुराने अभ्यास के कारण मेरे पास एक छवि है जिसको मैं सही मानता हु उसको वैसा न मानने के पीछे मेरे अंदर डर है कि मेरी कामनाओं का क्या होगा यदि मैने उस वस्तु को परख लिया जिसे मैं जैसा समझ रहा हूं वह वैसी बिल्कुल नहीं है। 2 समझ का तो क्या बताऊ धारणाएं और डर और ऊपर चढ़कर हावी हो रहे है। और उन डर से झूझने को मै खुद को और कमजोर पाता हूं 3 अभी स्थिति ऐसी है जैसे समुद्र के किनारे हम रेत से आकृति बनाते है और लहर आते है वह हमारी आकृति साफ हो जाती है हमारी धारणाएं बढ़ रही है लेकिन आचार्य जी के ज्ञान की लहर से सब साफ हो जाता है लेकिन मेरा स्वार्थ देखो मै इस सफाई के3 लिए धन्यवाद भी नहीं बोलता हु उल्टा खींचता हूं कि जब मै आचार्य जी को नहीं जानता था तो बहुत अलग आत्मविश्वास चारों दिशाओं को भागने के तत्पर जो जैसा कह दे वैसा करने को तैयार उसी से फिर सम्मान मिलता था।



















