SAURABH SAHU1 मै किसी भी चीज को नहीं देख रहा हु मैं बस अपने अनुभव और पुराने अभ्यास के कारण मेरे पास एक छवि है जिसको मैं सही मानता हु उसको वैसा न मा…
सौरभ जी, वो लहर और रेत वाली बात एक जगह अटक रही है। लहर आकर आकृति साफ करती है, ये तो आपने देख लिया। लेकिन साफ होने के ठीक बाद आप खुद वही पुरानी रेत फिर से उठाकर उस दिशा में फेंक रहे हैं जहाँ से लहर आई थी, ये कहते हुए कि पहले वाला आत्मविश्वास बेहतर था। यानी सफाई हो भी गई तो मन ने उसी वक्त तय कर लिया कि पुरानी आकृति ज्यादा अपनी थी। जिस आत्मविश्वास को आप याद कर रहे हैं, वो दरअसल किसी दिशा से नहीं, बल्कि हर दिशा में दौड़ने की तैयारी से आया था, यानी कोई ठहराव ही नहीं था वहाँ। जो जैसा कहे वैसा करने में जो सम्मान मिलता था, वो सम्मान इस बात का था कि आप किसी के काम आ जाते थे, अपने किसी होने की वजह से नहीं। अब वो चलना बंद हुआ है तो खालीपन लग रहा है, और मन उसे आत्मविश्वास का नाम देकर वापस माँग रहा है। धन्यवाद न बोलना उतनी बड़ी बात नहीं जितनी ये कि सफाई के बाद भी रेत का ढेर वही दिशा पकड़ लेता है। यही अगली बार देखने वाली जगह है।


















