
Weekend With Master 8.0 से अवलोकन: मैं लगभग ढाई साल बाद भारत वापस आई हूँ और मैं सबसे ज़्यादा आनंदित इसलिए थी कि मैं गोवा में पहली बार अपने देश में आचार्य जी को सुन सकूँगी और HIDP में भाग ले सकूँगी। जैसे ही घर आने का निर्णय लिया तो सबसे पहले अपने माता- पिता को गोवा चलने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने मना कर दिया तो थोड़ा ख़राब लगा, लेकिन फिर बिना कुछ सोचे अपना registration करा लिया कि कुछ भी हो जाए मैं तो जाऊँगी। फिर अन्य गीता प्रतिभागियों के साथ मिलकर सारा इंतज़ाम हो गया। शुक्रवार (२१ अगस्त) को हम चार लोग एक जगह पर रहने के लिए उपस्थित हुए और उसके बाद शुरू हुआ हमारा सत्संग। हम चारों एक दूसरे को या तो बिल्कुल नहीं जानते थे या बहुत कम जानते थे, लेकिन पहली मुलाक़ात से ही ये कभी लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिले है। आचार्य जी की शिक्षाओं ने हमे जीवन का जो आधार दिया है वो ही हमारे जीवन का संचालक बन गया है। हम हर दिन सुबह उठते, एक दूसरे का हाथ बँटाकर नाश्ता बनाते, फिर HIDP करने के लिए जाते, वापस आते तो क्या सीखा वो साझा करते, फिर शाम को सत्र में जाते, सब लोगो के साथ भजन पर झूमते, सत्र करते और सत्र के बाद एक गहन चर्चा होती जो हमे बेहतर तरीके से शिक्षाओं को जीवन में उतारने में मदद करती। इतना प्रेम शायद ही मुझे अपने परिवार से कभी मिला है। परिवार क्या होता है ये मुझे सत्संगति पाकर समझ आया। यहाँ सब एक दूसरे को आगे बढ़ने में ही मदद करना चाहते है। हमारी चर्चा में उम्र, अनुभव, या बाक़ी कोई बात बीच में नहीं आती, बस ईमानदार अवलोकन और नीयत से जीवन को लगातार बेहतर से बेहतर बनाने की दिशा में ही प्रयास रहता। फिर जब WWM के सत्र हो गए तो हम दो दिन goa भ्रमण के लिए निकले, उसमे भी ज़ोर बस इसी बात पर रहा कि कैसे हम अपने आपको अपने संस्कारों की जकड़ से मुक्त करे। कैसे हम जो अनमोल हीरा आचार्य जी ने हमे दिया है उसको बाक़ी लोगो तक भी पहुँचाये। शशि जी ने जिस बेबाकी और खुलेपन से संपर्क में आते लोगो से बात की वो देखकर मुझको भी साहस मिला। हमने दो दिन में कई लोगो से बात की और उनको आचार्य जी की शिक्षाओं से परिचय कराया। मुझे beach पर घूमने आए कुछ युवा लोगो से बात करने का मौका मिला तो वो पूछने लगे कि आप चार लोग एक ही परिवार से आए है क्या? फिर जब मैंने बताया कि हम आचार्य प्रशांत के शिष्य है और यहाँ सत्र करने आए है, तो उनका बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर उनको आचार्य जी के बारे में बताया, गीता community के बारे में बताया और बताया कि कैसे मेरा जीवन बदला है शिक्षाओं से। फिर आगे मैंने climate change पर बात करना शुरू किया कि उनको क्या लगता है climate change क्यों हो रहा है? उनके जवाब हैरान करने वाले थे, इतनी भयानक स्थिति में भी कोई कैसे अंजान रह सकता है। उनसे आगे बात की और उनको भीतर की बेचैनी तक लेकर जाने का प्रयास किया। उन्होंने बोला कि वो सुनेगे और उनको ये सुनकर थोड़ा जागरूकता और रुचि भी जगी। अगर मैं ख़ुद को देखूँ तो मैं ऐसी कभी भी नहीं थी जो इतना खुलकर बोल सके, ख़ुद को छोड़कर किसी और के बारे में भी सोच सके, जब मेरे बारे में कोई तथ्य सामने आए तो तुरंत आत्म संरक्षण को छोड़कर समझने का प्रयास कर सके। ये सब आचार्य जी के जीवन में आने से ही संभव हो पाया है। अब तो बस यही लगता है कि ये यात्रा चलती रहे और ऐसे ही जानने की दिशा में आगे बढ़ती रहूँ। धन्यवाद आचार्य जी! मैं अपने इन पाँच दिनों को कबीर साहब के एक दोहे से अभिव्यक्त कर सकूँ तो वो ये होगा: “राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय। जो सुख साधु संग में, सो बैकुंठ न होय।।”











































