
बोध कार्य: 06/08/2026 1⃣मेरे अनुभव में लड़कियों के खेलों से दूर होने का एक बड़ा कारण केवल सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि समाज की नज़र है। मैं अपनी 12 वर्षीय बेटी वेदिका को रोज़ स्विमिंग के लिए लेकर जाती हूँ। कुछ दिन पहले मैंने देखा कि लगभग 16–17 वर्ष की दो लड़कियाँ अभ्यास से ज़्यादा समय अपने कपड़े ठीक करने में लगा रही थीं। वे बार-बार अपनी टी-शर्ट नीचे खींच रही थीं, मानो तैराकी से ज़्यादा चिंता लोगों की नज़रों की हो। मुझे लगा कि समाज लड़कियों को बचपन से ही शरीर के प्रति इतना सजग और असहज बना देता है कि खेल भी खुलकर नहीं खेल पातीं। समस्या शरीर में नहीं, देखने वाली दृष्टि में है। लेकिन लोकधर्म बार-बार यही सिखाता है कि "लोग क्या कहेंगे?" और यही डर लड़कियों की स्वतंत्रता और खेल—दोनों को सीमित कर देता है। आचार्य जी से जुड़ने के बाद समझ आया कि जीवन भीड़ की मान्यताओं के अनुसार नहीं, सत्य के अनुसार जीना चाहिए। जब तक लोकधर्म हावी रहेगा, तब तक खेल के मैदान में बराबरी केवल नीतियों से नहीं आएगी, दृष्टि बदलने से आएगी। 2⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी इसलिए कहते हैं क्योंकि हमारी पहली पहचान ही शरीर से बन जाती है—मैं स्त्री हूँ, पुरुष हूँ, सुंदर हूँ, कमजोर हूँ। फिर पूरा जीवन इन्हीं पहचानों की रक्षा और तुलना में निकल जाता है। जब तक हम स्वयं को केवल शरीर मानते रहेंगे, तब तक समाज भी हमें शरीर के आधार पर नियंत्रित करता रहेगा। शरीर साधन है, हमारी वास्तविक पहचान नहीं। यही समझ हमें भय और हीनता से मुक्त करती है। 3⃣मैं हरियाणा से हूँ, जहाँ खेलों का अच्छा माहौल है। लड़को के मुकाबले लड़कियों का रुझान तो कम है पर फिर भी काफी है। मैंने अपनी बेटी वेदिका को बचपन से किसी न किसी खेल से जोड़े रखा—पहले स्केटिंग, फिर कराटे और अब स्विमिंग। आज वह 12 वर्ष की है, जिला स्तर पर दूसरा स्थान प्राप्त कर चुकी है और स्कूल गेम्स की जिला स्तरीय प्रतियोगिता की तैयारी कर रही है। आचार्य जी से जुड़ने के बाद बच्चों की परवरिश को लेकर मेरी दृष्टि बदली है। अब मेरा उद्देश्य केवल पदक नहीं, बल्कि बेटी का निर्भय, स्वतंत्र और स्वस्थ व्यक्तित्व है। खेल अब मेरे लिए प्रतियोगिता से अधिक आत्म-विकास का माध्यम है। विडियो में बेटी वेदिका (रेड कैप) में ❤❤





















