
1. भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है। इसके पीछे बहुत गहरी मान्यताएं काम करती है। लोक धर्म लड़कियों का खेलने ठीक नहीं समझा जाता । मैंने कथाओं में भी लड़कियों को खेलने आगे बढ़ाने वाली कथा नहीं सुनी । टीवी के सीरियल में मैंने देखा था एक लड़की अपने महल में दौड़ती हुई आती है तो उसकी मां उसे कहती है पुत्री तुम कन्या हो हिरनी नहीं हो तुम्हें दौड़ते हुए शोभा नहीं देता। हमारे टीवी सीरियल भी इस प्रकार दिखाएंगे तो समाज में यह सब देखने को मिलता है। मेरी एक पड़ोसन के साथ में एक दिन मैदान में वॉक पर गई थी वहां पर कुछ लड़कियां साइकिल पोलो का प्रेक्टिस कर रहे थे तब मेरी पड़ोसन बोली मेरी बेटी भी पहले साइकिल पोलो सिखाती थी तब मैं बोली अब क्यों नहीं खेलती। उसका जवाब था उसके पापा खेलने से मना कर दिए क्योंकि गिर जाएगी तो हाथ पैर टूट जाएगा। तो उसका रिश्ता कैसे होगा। जब मेरी शादी हुई थी तब मुझे भी बहुत खेलने का शौक था, मैं अपने हस्बैंड से बोली चलो आंगन में वॉलीबॉल खेलते हैं। वह एक-दो दिन मेरे साथ खेले उसके बाद बंद कर दिये। उसके बाद मैं अपने देवर से कहा चलो वॉलीबॉलीमें खेलते हैं । वह भी नहीं खेला ना वह कोई प्रतियोगिता था मात्र अपने खुशी के लिए खेलना था उसमें भी मुझे सहयोग नहीं मिला । 2. आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी इसलिए कहते हैं क्योंकि अहंकार के पास कोई विषय नहीं होगा फिर भी शरीर तो होगा। अपनी हस्ती को अनुभव करना मैं हूं इसको अनुभव करना यही इगो है।


















