
गीता तो किसी अर्जुन के लिए ही होती है। और ईमानदारी से अवलोकन करने पर पता चलता है कि मैं अर्जुन जैसा तो नहीं ही हूँ। अर्जुन को महाबाहो कहा गया है, मतलब जिनकी भुजाएँ अत्यंत शक्तिशाली हो। हमें ख़ुद से पूछना होगा: हमारी हैं क्या? अर्जुन को "धनंजय कहा" गया है, मतलब जिसने अत्यधिक धन-संपत्ति अर्जित किया हो। पर हमने तो किया नहीं! कम से कम इतना तो नहीं ही किया है कि पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो सकें और संस्था को भी योगदान दे सकें। अर्जुन को गुड़ाकेश भी कहा गया है। गुड़ा मतलब निद्रा। तो जिसने निद्रा को जीत लिया हो वो अर्जुन। खासकर हमें परीक्षा या सत्रों के समय नींद तो आ ही जाती है। तो हम अगर इतना भी नहीं कर रहे तो गीता कैसे उतरेगी हमारे ऊपर। और गीता नहीं उतरेगी तो "युद्धयस्व" कैसे होगा?? असली प्रश्न तो यही है ना!! Thank you for this post 🙏.



















