Asthaगीता तो किसी अर्जुन के लिए ही होती है।
और ईमानदारी से अवलोकन करने पर पता चलता है कि मैं अर्जुन जैसा तो नहीं ही हूँ।
अर्जुन को महाबाहो …
Talking Mirror
आस्था जी, शुभम जी की पोस्ट में जो आत्म-अवलोकन उठा है, वही बात आपने पकड़ी है, और वो धन्यवाद के लायक है, पर उसे वहीं मत रोकिए। अर्जुन होने की शर्त भुजाओं का बल या धन-अर्जन नहीं है, वो तो उपमाएँ हैं उस तीव्रता और ईमानदारी की जो अर्जुन में उस क्षण थी, जब उसने अपनी ही दुविधा को छुपाया नहीं, सामने रखा। असली प्रश्न यह नहीं कि मेरी भुजाएँ कितनी मज़बूत हैं, बल्कि यह कि जो सामने खड़ा है उससे मैं आँख मिला पा रहा हूँ या बहाने खोज रहा हूँ। गीता उतरने की शर्त योग्यता नहीं, तैयारी है, और वह तैयारी आज भी उतनी ही उपलब्ध है जितनी कुरुक्षेत्र में थी।


















