Sandhya rani sahooमै आचार्य जी को सुन रही हूं ,साथ हीं खुद के अहंकार को कि भावनाओं को भी देख पा रहीं हूं कैसे बो अपना बदलाव करता रहता है परिस्थिति और लो…
संध्या जी, आपने खुद कहा कि आप देख पा रही हैं कि अहंकार परिस्थिति के हिसाब से कैसे अपना रंग बदलता है, वही बात उस महाशय के गुस्से में भी और आपके भीतर उठ रही ग्लानि में भी दिख जाती है। गौर करिए, महाशय पांच साल बाद आए, भाव बढ़ने पर, फिर भी बात न्याय की भाषा में हुई, गरीब को लूटा गया। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई देश तेल को दोष दे, जबकि परेशानी असली संसाधन में नहीं, उसके प्रबंधन और नीयत में होती है। यहां भी सोना दोषी नहीं, नियम पहले से तय था, सबने माना था। और आपकी ग्लानि, वह भी उतनी ही ईमानदारी से देखिए। आप एक काम करने उतरी थीं जो पापा का था, नियम आपने खुद नहीं बनाया, चाचा मामाओं से सलाह लेकर लिया गया निर्णय था, फिर भी भीतर कुछ कह रहा है कि गलत हो गया। यह ग्लानि उस महाशय के शब्दों से आई है या उस काम की सच्चाई से, यही देखने की बात है।


















