
मै आचार्य जी को सुन रही हूं ,साथ हीं खुद के अहंकार को कि भावनाओं को भी देख पा रहीं हूं कैसे बो अपना बदलाव करता रहता है परिस्थिति और लोगों के बदलने से बो भी किस तरह बदल रहा है । यहां पर मै एक घटना का जिक्र करना चाहूंगी ,मेरे पापा के चले जाने के बाद उनका एक काम जो मुझे हीं करना पड़ रहा हैं,बो है साहूकारी का काम बो सोना रखकर लोगों को सुध पर पैसा देते थे। हर कोई आता है अपना सुध मूल देता है और सोना लेकर चला जाता है । जो सोना तीन साल से जादा रह जता है उसको , वहां वे मूल और सुध को जोड़ देते है और एक कर दिया जाता है और वहां से फिर सुध आरंभ होता है ,सब ठीक ठाक चल रहा था किसीने भी जादा कुछ नहीं कहा सब लेकर चले गया अपना अपना जो था सब । अब एक महाशय आते है अपना सोना लेने तो बो होगया होता है 5 साल का तो बो बहुत कुंठित होते है देने के लिए ,बहुत कुछ कहते भी है जो मेरे अहंकार को ठोस पहुंचता है । उन का कहना था तुम पछताओगी की तुम ने एक गरीब का पीसा लूटा है ,वहां पर भी उनका तर्क यहीं था कि कोई नहीं लेता तुम्हारे जैसे ,तो मैने भी कहा 3 साल तक होता तो सही था तीन साल के बाद तो ऐसा लगन लग ही जाता है ,मैने भी खुद से ऐसा फ़ैसला नहीं लिया , क्यों कि मैने ये काम कभी किया नहीं ,तो मेरे चाचा और मामाओं से परामर्श करने के बाद ये फैसला लिया गया ,और आप लोग आते भी अभी क्यों कि अभी सोने का भाव बढ़ गया इस लिए आए हो । अब मेरे साथ क्या हो रहा है ,मै तो पहले से ये सोच लिए बैठी थी कि ये सब साहूकारी का काम गलत है ,फिर ये काम जब मेरे माथे आई तो मैने सोचा कि ,इंसबको भी मै आचार्य जी के साथ साक्षात्कार करवा सकती हूं ,पर हो नहीं पा रहा है । जितने भी लोगों से मैने कुछ कहा ,जैसे आप लोग ये सो पैसे लेते हो और सुध लाकर देते हो क्या तुम्हे भी कुछ फायदा होता है ,तो उन्होंने कहा हम खुद पैसे रख नहीं पाते और कोई बिना सोने के बहुत सुध ले लेता है जैसे तुम 2 लोगे तो बिना सोने के 10 रुपए ले लेंगे । बो अपनी कहते है ,मै अपनी कुछ बताना चाहती हूं समझा नहीं पा रहीं हूं किसीको भी । भीतर से एक ग्लानि भाव उठ रहा है ,कुछ काम करने को उतरी थी और कुछ और हीं होता जा रहा है ।



















