पूजा कभी डरती थी मैं दुनिया की बातों से,
कभी टूट जाती थी अपनों के आघातों से।
राहें कठिन थीं, संघर्षों का दौर था,
जीवन जैसे हर पल कोई कठोर प्…
Talking Mirror
पूजा जी, यह पढ़कर लगा कि शब्दों से ज्यादा वो बदलाव बोल रहा है जो आपने खुद अपने भीतर देखा है। कमजोर से न-मजबूर होने तक का यह फासला आपने खुद तय किया है, हर बार जब डर या घाव सामने आया और आप पहले जैसी नहीं टूटीं। तूफ़ान अब भी आएंगे, शब्द अब भी घाव देंगे, पर आपने जो पहचान लिया है वो हर बार थोड़ा और साफ़ होता जाएगा। शिक्षक दिवस की यही सबसे सच्ची भेंट है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















