
कभी माला , रुद्राक्ष और मंत्र जप को मुक्ति और धर्म समझती थी । पूजापाठ,ध्यान खूब किया पर बेचैनी और बढ़ गई। वासना का दामन किया जानने के स्थान पर। पर अब मेरी लिए वासना कोई समस्या नहीं है । न नौकरी के पीछे भागती हूं । ना कर्मकांड करती हूं । गीता सत्र से जुड़कर खुद को मजबूत बनाने की यात्रा पर हूं। अपने बेईमानी को देखती हूं। कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए खुद को तैयार कर रही हूं। गीता सत्र में 3 साल होने जा रहे हैं पर बचपन से कुरीतियों से लड़ते लड़ते , और पढ़ाई के माहौल न मिल पाने के कारण सफाई बहुत ज्यादा करनी पड़ी। जो कुछ नहीं जानता उसका रास्ता आसान होता है। जो बहुत कुछ जानकारी भरा होता है ,उसे खुद से बहुत ज्यादा लड़ना पड़ता है। मैं बचपन से ही समाज सेवक बनना चाहती थी ।स्वामी विवेकानंद से प्रभावित थी ।पर ज्यादा नजदीकी नहीं थी किताबों से और किताब पढ़ने भी जाती थी तो ज्यादा समझ नहीं आता था। सही किताब मेरे साथ ही नहीं लगे थे ,जो मुझे खुद को देखने की ओर इशारा करे। आचार्य जी के साथ किताब पढ़ना सिखा ,भीतर का कुंठा,छुटपन , और छोटा महसूस करने से बाहर आयी। अब खुद की चौकीदार हूं। किसी और पर अपने देख भाल के लिए निर्भर नहीं हूं। थोड़ी निर्भरता आचार्य जी पर है । आज भी आचार्य जी को सुनकर अहंकार को कम ही करने के रास्ते पर हूं।





















