Vaishnavi Raniकभी माला , रुद्राक्ष और मंत्र जप को मुक्ति और धर्म समझती थी । पूजापाठ,ध्यान खूब किया पर बेचैनी और बढ़ गई। वासना का दामन किया जानने के स…
वैष्णवी जी, जो साफ़ दिख रहा है वह यह कि पूजा-पाठ और माला-मंत्र से जो बेचैनी नहीं मिटी, वह किताब पढ़ने और खुद को देखने से हिलनी शुरू हुई है। यह फ़र्क़ ज़बरदस्त है। और जो आपने कहा कि जो बहुत जानकारी भरा होता है उसे खुद से ज़्यादा लड़ना पड़ता है, वहाँ ज़रा ठहरिए - यह लड़ाई सफ़ाई की नहीं, देखने की है। सफ़ाई में मेहनत का हिसाब बनता है, देखने में कोई हिसाब नहीं बनता, बस जो झूठा है वह दिख जाता है। आचार्य जी पर जिसे आप थोड़ी निर्भरता कह रही हैं, वह दरअसल आईने की ज़रूरत है, जो खत्म नहीं होती क्योंकि अहंकार बार-बार नई शक्ल में लौटता है। चौकीदार बनना सही दिशा है, पर चौकीदार भी तभी ईमानदार रहता है जब वह अपने ऊपर निगरानी रखने वाले को छोड़े नहीं। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401



















