
✍🏻 पोस्ट 1 | 17 अक्टूबर '26 💭 विषय — पर्यावरण और जलवायु ────────── 🌊 जिन नदियों को माँ कहते हैं, उनकी हालत इतनी ख़राब क्यों है? 🙏 भारत में गंगा और यमुना को पवित्र माना जाता है। लाखों लोग इन्हें माँ कहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी देखा है कि आज इन नदियों में बह क्या रहा है? 😨 दिल्ली में यमुना की सतह पर कई बार सफ़ेद झाग की मोटी परत दिखाई देती है। यह नदी में पहुँच रहे सीवेज और रसायनों से जुड़ी गंभीर समस्या का संकेत है। 🏭 घरों से निकलने वाला मलजल, डिटर्जेंट, औद्योगिक अपशिष्ट और नालों का दूषित पानी नदियों में पहुँचता है। डिटर्जेंट में मौजूद सर्फेक्टेंट झाग बनने में योगदान देते हैं। 📊 जुलाई 2025 में केंद्र सरकार ने बताया कि दिल्ली में रोज़ लगभग 3,596 मिलियन लीटर सीवेज निकलता था। इसमें करीब 641 मिलियन लीटर बिना उपचार के रह जाता था। वहीं 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में से 14 निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतर रहे थे। 💧 दिसंबर 2025 के आँकड़ों के अनुसार, गंगा किनारे के पाँच राज्यों में रोज़ लगभग 10,160 मिलियन लीटर सीवेज पैदा होता था, जबकि उपचार की क्षमता 7,820 मिलियन लीटर थी। 🐟 प्रदूषण से पानी में ऑक्सीजन घट सकती है, जलीय जीव प्रभावित होते हैं और बीमारियों का ख़तरा बढ़ता है। 🌍 कई देशों में नदियों को केवल प्राकृतिक जलधारा माना जाता है। फिर भी वहाँ गंदे पानी के उपचार और प्रदूषण नियंत्रण को गंभीरता से लिया जाता है। 🪞 जिस नदी को हम दूषित करते हैं, उसी का पानी हमारे जीवन में लौटता है। जिस हवा को प्रदूषित करते हैं, उसी में साँस लेते हैं। प्रकृति से हमारा अलग अस्तित्व नहीं है। फिर भी हम ऐसे जीते हैं, मानो प्रकृति को नुकसान पहुँचाकर हम स्वयं सुरक्षित रह सकते हैं। 💭 सवाल है, हम ऐसा करते क्यों हैं? हम अपनी सुख-सुविधाओं और इच्छाओं के लिए प्रकृति की कीमत चुकाने को तैयार क्यों रहते हैं? क्या हमने कभी अपनी इच्छाओं को, उनके पीछे छिपे स्वार्थ को और जीवन के प्रति अपनी धारणाओं को जाँचा है? 🌱 केवल बाहरी व्यवस्था को बदलना पर्याप्त नहीं, यदि भीतर वही अज्ञान बना रहे जो शोषण को जन्म देता है। तकनीक और नीतियाँ प्रदूषण रोकने के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन यह समझना भी ज़रूरी है कि हमारी कामनाएं प्रकृति के साथ हमारे संबंध को कैसे प्रभावित करती हैं। स्वयं को जाने बिना हम अपनी कामनाओं, अपने कर्मों और उनके परिणामों को पूरी तरह कैसे समझ सकते हैं? आप बताइए 👇 ❓ प्रकृति को जानने के लिए स्वयं को जानना ज़रूरी है। तो आप स्वयं को जानने के लिए क्या कर रहे हैं? A. अपनी इच्छाओं और उनके पीछे के कारणों की जाँच कर रहा/रही हूँ। B. गीता और दर्शन के माध्यम से स्वयं को जानने का प्रयास कर रहा/रही हूँ। C. आचार्य जी को सुनता/सुनती हूँ और उनकी बातों को अपने जीवन में परखता/परखती हूँ। D. अभी तक इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है। E. मुझे क्या जानना है? मैं तो पहले से ही सब जानता हुं! 📚 स्रोत: https://www.hindustantimes.com/india-news/froth-reappears-in-yamuna-despite-record-defoamer-use-101769470538254-amp.html https://www.teriin.org/project/study-yamuna-frothing-delhi?

















































