
आचार्य जी, 🙏 मैं कई दिनों से सोच रही थी कि मैं अपनी बेटी के बारे में एक अवलोकन लिखूँ। बेटी अपने वकालत के क्षेत्र में धीरे धीरे आगे बढ़ रही हैं चुनौतियों का सामना करते हुए । आचार्य जी, जब मेरी बेटी एक जूनियर के रूप अपनी वकालत शुरू की थी तो मेरे मन में उस वक्त बहुत सारे डर भरे थे । बेटी के लिए जो मेरे मन में डर बैठा था वो उनकी सुरक्षा को लेकर था क्योंकि लड़की जो हैं । आचार्य जी, मेरे जीवन में दो बातें साथ साथ चलीं । एक बेटी की वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद जूनियर के रूप में एक प्रतिष्ठित सिनियर वकील के यहाँ काम करना और आपका मेरे जीवन में प्रवेश करना। आचार्य जी, आप अगर मुझे न मिलते तो शायद मैं बेटी को वकालत के क्षेत्र में भेजने से बहुत घबराती । इसके बहुत सारी वजहें थीं । एक तो मेंरे परिवार से कोई भी दूर - दूर तक वकील नहीं था तो संघर्ष ज्यादा करना पड़ता । लेकिन बेटी आगे बढ़ीं तो सिर्फ अपने कड़ी मेहनत के बल पर । आचार्य जी , बेटी चेंबर सबसे पहले पहुँचती थीं और सारे जूनियर के जाने के बाद घर आती थीं । बेटी को ऑफिस के पॉलिटिक्स के बारे में कुछ भी नहीं पता था । बस सीधी और सच्ची बात जानती थीं । आचार्य जी, बेटी को शुरू के तीन-चार साल बहुत संघर्ष भरे रहे । अभी भी है लेकिन पहले से कम है । आप की दी हुई सीख मुझे मेरी बेटी के लिए दवा का काम करने लगी । बेटी को जो भी आत्मबल मिला उससे संघर्ष के बावजूद भी अपनी हिम्मत कभी नहीं हारीं और ना ही कमजोर पड़ीं । आचार्य जी , बेटी कहती हैं कि लड़कियाँ बहुत कम टिक पाती हैं वकालत के क्षेत्र में । क्यों कि या तो उनकी शादी हो जाती है या बच्चे पैदा कर लेती हैं । बेटी कहती हैं कि उन्हें भी व्यंग में बोला जाता था कि तुम भी शादी कर के वकालत छोड़ दोगी । आचार्य जी, बेटी कहती हैं कि जिन भी लड़कियों ने वकालत छोड़कर बच्चे और घर संभालना शुरू किया वह वकालत में बहुत अच्छा कर रही थीं । आचार्य जी , बेटी पहले जज बनने का नहीं सोचती थीं लेकिन अब कहती हैं कि मुझे जज के लिए भी मेहनत करते रहना है । आचार्य जी, बेटी अब ऑल इंडिया भी मुकदमें के सिलसिले से जाने लगीं हैं । आचार्य जी, मैने अपने ससुराल में बहुत अपमान सहे हैं तो बेटी को लेकर बहुत डर था मेरे भीतर कि एक दिन बेटी को भी कहीं यह सब झेलना ना पड़ जाए । मैने सोचा था कि अपने बेटी को शादी और ससुराल के ड्रामें से दूर रखना है, ससुराली झंझट से दूर रखना है । इसके लिए मुझे चाहे जो भी करना पड़े करूँगी । आचार्य जी , जब भी बेटी अगर शाम के टाइम चेंबर नहीं जाती हैं, ये तभी होता है जब वह बहुत ज्यादा थकी रहती हैं । तब वह उस समय का सदुपयोग गीता पढ़कर करती हैं । बेटी कहती हैं कि अगर बाॅस से झूठ ही बोला है तो क्यों न ये वक्त बेहतर किताबें पढ़ने में लगाएँ। 🤭 आचार्य जी , आपका बहुत-बहुत आभार बेटी को वकालत के क्षेत्र में पावँ जमाने में सहयोग के लिए । ये आपकी दी हुई समझ ही है जो बेटी को संघर्ष में अडिग रखती रही है । बेटी को भी गीता से जोड़ना है। प्रयास में हूँ , एक दिन जरूर जोड़कर रहूँगी । 😊































