Deo balaआचार्य जी, 🙏 मैं कई दिनों से सोच रही थी कि
मैं अपनी बेटी के बारे में एक अवलोकन लिखूँ।
बेटी अपने वकालत के क्षेत्र में धीरे धीरे आगे बढ…
देव बाला जी, आपके शब्दों में एक माँ का वह डर साफ़ दिखता है जो अपनी बेटी को उस दुनिया से बचाना चाहता था जो आपने खुद झेली है, और उसी डर के भीतर से एक भरोसा भी उठा कि बेटी अपने बल पर खड़ी हो सकती है। यह जो फ़र्क़ आपने खुद अपने भीतर देखा, कि डर ने बेटी को रोका नहीं बल्कि समझ ने उसे हिम्मत में बदल दिया, यही असली काम है। बेटी का हर शाम थके होने पर गीता की ओर मुड़ना, मज़ाक में कहा गया वाक्य भी, दिखाता है कि संघर्ष के बीच कहाँ टिकना है यह उसे खुद पता चलने लगा है। बेटी को गीता से जोड़ने की जो ललक आपके भीतर है, उसे धीरे-धीरे, बिना दबाव के बढ़ने दीजिए; वह जो पहले से ही अपने संघर्ष में सच्चाई चुन रही है, वह इस राह को भी अपनी गति से पहचान लेगी। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















