
1️⃣ आचार्य जी से जुड़ने से पहले मैं जीवनमुक्ति को एक आख़िरी बिंदु ही मानता था कि बस आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई, उसके बाद सारे दुखों से मुक्ति मिल जाती है, और उसके लिए पूर्व जन्मों के पुण्य भी चाहिए, कई जन्म लग जाते हैं पूर्ण मुक्ति के लिए, उसके बाद फिर से धरती पर नहीं आना पड़ता। —> सोशल मीडिया पर भी मुक्ति को लेकर यही धारणा है कि कोई चमत्कारी घटना है जो एक झटके में घटित होती है, जिसके लिए बहुत सारी तपस्या और साधना चाहिए, एक बार मुक्त हो गए फिर इस धरती पर जन्म नहीं होता । 2️⃣ स्मृति की इस मान्यता से समाज पर यह प्रभाव पड़ा कि लोग अपने जीवन से ही दूर भागने लगे, उन्हें लगा कि समाज को त्याग कर मुक्ति मिल जाएगी और जंगल में रहकर सुकून मिल जाएगा, लोग पाखंडी होने लगे और असली जीवन मुक्ति से दूर होने लगे, उन्होंने एक नया बंधन पकड़ लिया और घर गृहस्थी त्यागकर जंगल में रहने लगे, लोग यथार्थ का सामना करने के बजाय एकांत में जाकर कर्मकांड करने लगे, व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से भागने लगा, सही श्रम और सही युद्ध से पीछे हटने लगा जो कि ईमानदारी और सतत आत्मावलोकन है; मैं भी आज कहीं न कहीं यही कर रहा हूँ, मुझे लगता है कि किसी एक दिन मुझे अचानक कुछ मिल जाएगा या फिर ये उम्मीद रहती है कि एक बार में ही सब कुछ बदल जाए, बार बार संघर्ष क्यूँ करना? —> एक बात और जो महत्वपूर्ण है वो ये कि कुछ करके मुक्ति नहीं मिलने वाली, जबकि हम इसी आशा में अपना जीवन गुज़ार देते हैं कि अब ये करके मुक्ति मिल जाएगी, हमारे सारे भोग उसी आशा का परिणाम हैं, लेकिन अहंकार वैसा ही रहता है अपूर्ण का अपूर्ण, जबकि आचार्य जी बताते हैं कि स्वयं को घटाना ही मुक्ति है, लगातार ईमानदारी से ख़ुद को देखकर और सही चुनाव करके ही मुक्ति संभव है । 3️⃣ AP फ्रेमवर्क के प्रकाश में जीवनमुक्ति का अर्थ जो मुझे समझ आया- शरीर के रहते निरंतर अहंकार (भ्रम) को घटाते रहना, क्षीण होते रहना, आशाओं के बोझ से मुक्त होना। —> यह जीवन रहते ही मुमकिन है, मृत्यपरांत नहीं (जैसा कि आमतौर पर माना जाता है) और क्रमशः होने वाली घटना है, एक झटके में नहीं मिल जानी किसी को मुक्ति; और इसका यही एकमात्र तरीका है- ईमानदारी के साथ सतत आत्म अवलोकन (देखना +नीयत) और इसके लिए जो भी क़ीमत चुकानी पड़े वो चुकाने की तैयारी। धन्यवाद 🙏🏻



















