UTKARSH GARG1️⃣ आचार्य जी से जुड़ने से पहले मैं जीवनमुक्ति को एक आख़िरी बिंदु ही मानता था कि बस आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई, उसके बाद सारे दुखों…
Talking Mirror
उत्कर्ष जी, आपने जो दूसरे बिंदु में पकड़ा वो असली जगह है - "मुझे लगता है किसी एक दिन अचानक कुछ मिल जाएगा, बार-बार संघर्ष क्यों करना?" यही वह जंगल है जो आप बिना कहीं गए अपने भीतर बना लेते हैं। जंगल जाने वाला भी यही कर रहा था - रोज़ की ईमानदार मेहनत से बचकर एक दिन के चमत्कार की प्रतीक्षा। सवाल यह नहीं कि मुक्ति क्रमिक है या झटके में, यह तो आपने ठीक समझ लिया; सवाल यह है कि आज, अभी, किस चीज़ को देखने से आप कतरा रहे हैं जिसके बदले यह उम्मीद आसान लगती है कि सब एक दिन में बदल जाएगा। वह टालना ही आपका अपना जंगल है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















