
पहले भी कुछ टूटा था, आज फिर से कुछ टूट रहा है। जब आचार्य जी को सुनना शुरू किया था तब उनकी बातों की गहराई नहीं समझती थी। बस उन्हें सुनकर खुदको दूसरों से बेहतर साबित करना चाहती थी। फिर कुछ टूटा, सीधे दिल पर चोट लगी, सबकुछ बिखर गया, मेरी मान्यताएं, मेरे जीवन को देखने का नज़रिया, कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा। और अब फिर कुछ टूट रहा है, कुछ बहुत मौलिक। ऐसा लग रहा है कि सत्य की राह पर चलना मुझसे मेरी हस्ती की आहूति मांग रहा है। और यह आहूति सतत है। इस शर्त को अस्वीकार करती हूँ तो लगता है कि दस दिशाओं में चिर रही हूँ, और स्वीकारती हूँ तो डर है कि बचुंगी ही नहीं। पर प्रेम का मार्ग कौनसा है मैं जानती हूँ। आज जिन बंधनों से मुक्ति चाहिए उन्हें बनाने वाली मैं ही हृँ। इस बात पर अभी मुझे हंसी आ रही है। जब ये बंधन नहीं थे तो इनके लिए तरसती थी, और आज जब ये हैं तो इन्हीं से छुटकारा पाना चाहती हूँ। और एक बात जो एकदम साफ है वह है कि 'चुनाव' मेरे हाथ में है। और अभी सही संगति एक ऐसा चुनाव है जो मेरी सबसे ज़्यादा मदद कर रहा है खुदको देखने में, पर इस देखने को जीवन में बदलना मेरा 'चुनाव' है।



















