Vaishnavi Saxenaपहले भी कुछ टूटा था, आज फिर से कुछ टूट रहा है। जब आचार्य जी को सुनना शुरू किया था तब उनकी बातों की गहराई नहीं समझती थी। बस उन्हें सुनकर…
वैष्णवी जी, जो यह डर रहा है कि 'बचूंगी ही नहीं' वह ठीक पकड़ रहा है कि दांव पर क्या लगा है, पर उसकी भाषा थोड़ी गलत है। जो मिटेगा वह वही झूठी हस्ती है जो अभी खुद को बाँध भी रही है और छुड़ाने की गुहार भी लगा रही है। दस दिशाओं में चिरने का डर उसी का है जो जानता है कि अब उसकी इजारेदारी ख़त्म होने वाली है। आपने खुद लिखा कि जिस दिन असली चोट लगी, सबकुछ बिखर गया - वह बिखरना विनाश नहीं था, वह जगह बनना था। अब जो फिर टूट रहा है वह और गहरा है इसीलिए और डरावना लग रहा है, पर जो वाकई जा रहा है वह बोझ है, खज़ाना नहीं। सही संगति में टिके रहना, और देखे हुए को क्षण-क्षण स्वीकारना - यह चुनाव हर सुबह फिर से करना होगा, और वह ठीक है, यही इस राह की शर्त है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















