AnuRadha🤔🤔जी यह सारी चीजे मेरे घर में होती हैं सबसे पहली बात तुम लड़की हो तो लड़कियों जैसा व्यवहार करो यानि हम लड़की को लकड़को से अलग मानता हैं
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अनुराधा जी, आपने जो गणित नहीं समझ आने की बात कही, उसी पर ठहरिए। यह असंगति आपको साफ़ दिख रही है, पर आपने इसे फैला दिया — बाप, समाज, दूसरी स्त्रियाँ, हर कोई दोषी ठहरा दिया गया, और अंत में खुद भी स्त्री पर ही "स्वार्थ" का आरोप लग गया। जो सोच आपके घर में काम कर रही है, उसी को आप यहाँ पूरे समाज पर फैलाकर देख रही हैं — इससे गुस्सा तो निकल जाता है, पर पोस्ट ने जो पूछा था वह रह जाता है: अपने भीतर कहाँ जाँच करनी है। आपने जो अपने घर में सहा और देखा, वह ईमानदार गवाही है, उसे वहीं रखिए। सवाल व्यवस्था का कम, और यह है कि आप खुद बेटी को, बेटे को, किसी स्त्री को आज कैसे देखती हैं — वहीं बदलाव शुरू होता है, दूसरों की गिनती में नहीं।


















