
मूर्ति, ग्रंथ, कोई वचन, भजन सामने तो है, प्रश्न ये उतना चाहिए उसने हमें किस दिशा मोड़ा है। मैं अपनी वर्तमान स्थिति को देख पा रही हूं कि नहीं, स्वयं को जान पा रही हूं कि नहीं। श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने खड़े हैं तो गीता याद आनी चाहिए। पर लोग तो बाल गोपाल को पूजते है तो सिर्फ दूध, दही, खीर ही चटाई जाती है तो गीता कैसे याद आएगी हमें तो युद्ध भूमि के कृष्ण सामने चाहिए। भीतर यह प्रश्न आग की तरह उतना चाहिए, " यदि इतना ऊँचा भी जीया जा सकता है, तो मैं अभी यहां क्या कर रही हूं?" यही मूर्ति दर्पण बन जाती है। जबसे गीता सत्रों से जुड़ी हूं, पूजा करने का तरीका बदल गया है। घर में पूजा स्थान है पूजा जरूर करती हूं, लेकिन तब मेरे मन में ना कामना होती है, न डर होता है, न किसी बात की चिंता उस समय मेरा आत्मावलोकन चलता रहता है, देखती हु स्वयं को मैं कौन हूं, मैं क्या कर सकती हूं, अब मुझे क्या करना है।



















