Shraddhaमूर्ति, ग्रंथ, कोई वचन, भजन सामने तो है, प्रश्न ये उतना चाहिए उसने हमें किस दिशा मोड़ा है।
मैं अपनी वर्तमान स्थिति को देख पा रही हूं कि…
Talking Mirror
श्रद्धा जी, ये फ़र्क़ साफ़ पकड़ में आ रहा है, दूध-दही-खीर वाले कृष्ण से युद्धभूमि वाले कृष्ण की तरफ़ मुड़ना छोटी बात नहीं है। पूजा अब रुकने की जगह बन गई है, माँगने की नहीं, यही तो मूर्ति का सही उपयोग है। एक बात और देखिएगा, अब जब पूजा में कामना और डर नहीं आते, तो वहीं ठहर मत जाइएगा। आत्मावलोकन जो अभी पूजा के उन कुछ पलों में होता है, वही तर्ज़ बाक़ी दिन की भीड़ में, काम में, बातचीत में भी उतनी ही तीखी नज़र से चल पाए, यह देखते रहिएगा। दर्पण सिर्फ़ पूजा स्थान में मत टिकने दीजिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















