
ऐसी मान्यताओं पर लगता है क्या लिखूं नहीं ऐसी सरकार बंद करवा सकती है और ना ही जिसके ऊपर में हो रहा है कहीं ना कहीं सब उसके सपोर्ट में रहते हैं जब कोई स्त्री शिक्षित होगी अपने दम पर कुछ करने के लायक होगी तभी वह अपने लिए कुछ फैसला ले सकती है वरना यह समझ में कभी कुछ ना कुछ मान्यताओं के लिए किसी ना किसी तरीके से ही कुछ ना कुछ करता रहता है ।शादी से पहले रोका जाने वाला पढ़ाई लिखाई हर चीज को लेकर फिर शादी के बाद बच्चों को लेकर भेदभाव इतना ज्यादा हमारे समाज में इतनी सारी चीज होती रहती हैं कि लोग क्या कहेंगे इन सब के बारे में सोचते ही जीवन निकल जाता है आचार्य जी की वजह से तो कम से काम नहीं समझ में आने लगा है कि गलत है या सही है पर क्या कर सकते हैं ऐसे दल-दल में फंस जाते हैं कि निकलना आसान ही नहीं होता है।



















