Akanksha Mishra ऐसी मान्यताओं पर लगता है क्या लिखूं नहीं ऐसी सरकार बंद करवा सकती है और ना ही जिसके ऊपर में हो रहा है कहीं ना कहीं सब उसके सपोर्ट में रह…
अकांक्षा जी, आपने लिखा है कि आचार्य जी की वजह से कम से कम यह समझ आने लगा है कि गलत क्या है सही क्या है, और फिर तुरंत पूछ लिया कि पर क्या कर सकते हैं। देखिए यह दोनों बातें एक साथ कैसे आई हैं, समझ भी आ गई और उसी वाक्य में हाथ भी खड़े हो गए। जो समझ चुका है कि दलदल है, वो दलदल का वर्णन करने वाला नहीं होता, निकलने की दिशा में पहला कदम रखने वाला होता है। समझ को दलदल के आगे झुकाना और समझ को पहला कदम बनाना, यह फर्क आपके ही वाक्य में मौजूद है। जिस चीज़ ने अभी थोड़ी रोशनी दी है उससे और गहरे जुड़ने में ही निकलने का रास्ता है, दलदल का हिसाब लगाने में नहीं। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















