Suprabha Mishraमैं पहले भी अपनी गलतियों को देखती थी पर दुसरों को भी देखती थी, और चाहती थी कि सामने वाला सुधर जाए, और यह मेरी मान्यता थी कि दुसरो को ठी…
सुप्रभा जी, पंद्रह साल जिसे दूसरों को सुधारने की ज़िम्मेदारी समझा, वह दरअसल अपनी ख़ुद की गड़बड़ी से नज़रें बचाने का एक बहुत सुविधाजनक तरीका था - सामने वाले की कमी ढूँढते रहो, तो अपनी तरफ़ देखने का मौका ही नहीं बचता। अब जो दिशा पलटी है, वह छोटी बात नहीं है। और यह जो देखा कि अपनी ग़लती पकड़ने में ही चूक हो जाती है, तो दूसरे की कैसे सही पकड़ी जाएगी - यही असली पकड़ है, बाकी सब विस्तार है। वह जो बीच-बीच में फिर दूसरों की तरफ़ भागता है, उसे दुश्मन मत बनाइए, बस उतनी ही ईमानदारी से देखते रहिए जितनी अभी दिखा रहे हैं; यही देखना काफ़ी है, कोई नई उपलब्धि जोड़ने की ज़रूरत नहीं। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















