
पहले तो सत्र से जुड़ने से पहले यही ख्याल और अपेक्षाएं थी, सामने वाले का पद कितना बड़ा है, प्रतिष्ठा कितनी ख्याति पाई है, समाज में बोलबाला उसका कितना है, नौकरी में सरकारी है या प्राइवेट। लेकिन अब गीता समागम से जुड़ने के बाद अपनी अपेक्षाओं, मान्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं, ये मेरी अपनी मौलिक समझ और चुनाव से आई या बाहरी प्रभाव।



















