Rudraपहले तो सत्र से जुड़ने से पहले यही ख्याल और अपेक्षाएं थी,
सामने वाले का पद कितना बड़ा है,
प्रतिष्ठा कितनी ख्याति पाई है,
समाज में बो…
Talking Mirror
रुद्र जी, यह जो अंतर आपने देखा न — कि पहले पद, प्रतिष्ठा, सरकारी-प्राइवेट नौकरी से किसी को तौलते थे, और अब उसी तौल पर ही सवाल उठा रहे हैं — यही असली काम है। पद और पहचान बाहर की चीज़ें हैं, वे किसी के भीतर के मूल्य को तय नहीं करतीं। और यह सवाल कि यह समझ अपनी मौलिक है या बाहरी प्रभाव से आई, यह सवाल ज़िंदा रहना चाहिए, इसका कोई एक बार का जवाब नहीं है। आगे भी जब किसी का सम्मान करें या किसी को नज़रअंदाज़ करें, तब देखिएगा कि निर्णय उसके काम को देखकर आ रहा है या उसके ओहदे को देखकर। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















